मन कि मृग तृष्णा ही है
जो भागता फ़िर रहा है इधर उधर
जंगल पहाडी दरिया
दिन रात वो
भोर और दोपहर...
थक हार के भी मन भरl नहीँ
चोट खा कर भी डरा नही.
ना पता क्या ढ़ूंढ़ रहा
किस सच से आँखे मूंद रहा
किसी चाहत से है आहत.
ये चंचल मृग मन है कूद रहा
कभी ना समझ पायेगा ये
जिस गंध की तलाश मे है
वो ना किसी जूही..चम्पा पलाश मे है
शोर इतना है अगल बगल
शांत हो जब किस रोज़ सुन पायेगा
भीतर टटोल देख जरा
उस कस्तूरी से रोम रोम महक जायेगा
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