जब तुम हो के भी नहीँ थे
और नहीँ हो कर भी सभी जगह थे
आज तुम नहीँ हो पर
हर वक़्त मेरे साथ तुम्हारी शरारती सी आँखें
मेरे पीछे पडी रहती है
सुबह शाम बस श्याम श्याम
कहते गुजरते है दिन
शायद समय भुला देगा इन्हे भी पर
क्यू थमते नही ये...आँसू
मन करती है बुला के देखूं
तुम लौट आयोगे शायद
फ़िर सोचा छोडो
तुमे भी मेरी याद आती होगी शायद
तुम कह के गये थे..मैं जब तक न बुलाऊ
तुम खड़ी रहना दहलीज पर
वही मैं रहुगी इन्तेजार मे
मुझे लगता है कि तुम लौटोगे शायद
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