वो जा रहा था मस्त सा
बेफिक्र गुनगुनाता हुया...
कन्धों पर बन्दूक लिये
पूंछा एक रोज़ किसीने रोक के उसे..
कि आखिर तुम करते क्या हो ?
हम यहाँ बड़े किलस रहे हैं
दिन रात दौड़ धूप करके
अपनी गुजर कर रहे हैं.
रोज़ चिल्लाती सड़कों पर रेंगेते हुए
दफ्तर आते जाते हैं
औऱ फ़िर कई फाईलों के नीचे दब जाते है.
तुम को किस बात के पैसे मिलते है ?
क्युँकि तुम तो बस खेलते हो दौड़ते हो
आखिर तुम करते क्या हो ?
मुड़ कर उस सैनिक ने पीछे देखा
हँस के बोला बताता हूँ दोस्त
थक कर जब तुम घर जाके बेफिक्री से
सो जाते हो...उस मखमली रजाई मे..
अपने परिवार के साथ बतियाते हो
मैं उस मिट्टी मे अकेला लेट जयुँगा
औऱ उस बर्फीली मे थरथर हो जाऊँगा
गर्मी और जंगल के स्याह अँधेरे मे
बेखौफ चौकन्ना रहता हूँ
कि वहाँ दूर मेरे देशवासी सोते है
यह सोच के हर वार मै सहता हूँ.
औऱ जब आती है बारीशे बाढ़ आंधी तूफां
तहस नहस सब घर गाँव मकान
मै झूझता अपने लोगो के लिये
कि दे सकूं उनको कुछ आराम
जब तुम मनायोगे ईद होली दीवाली
तब हम काटेंगे इधर उम्र अपनी
दूर कही पहाड़ जंगल या सरहद पर
पड़े होँगे कड़ी धूप मे या करगे अपनी रातें काली
कि कुछ औऱ पूँछना है ए दोस्त मेरे..तो बता
मेरी कीमत इतनी है कि बस
पूछोगे मुझको...जब दे दूँगा मै जां..
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