Tuesday, November 26, 2019

मैं कितना जूझी हूँ ख़ुद से

मैं कैसे जूझी हूँ ख़ुद से 
मुझे ही हैं पता 

वायदा जो था ख़ुद से 
कभी आँसू ना बहायेंगे सो 
बेइन्ताह आंसुओं का सैलाब 
कैसे रोका है खुद से 
मुझे ही हैं पता
अनगिनत नश्तर आज़ भी कहीं है मुझ में 
कर के मरम्मत हर दर्द की 
सौ ज़ख़्म कैसे छुपाये है ख़ुद से 
मुझे ही हैं पता

मैं नाउम्मीद थी कितनी फिर भी 
तू ख्याली ख़्वाब दिखाता रहा 
मैं हर टूटे ख़्वाब पर 
कितना मनाती रही ख़ुद को 
मुझे ही हैं पता

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