मुझे ही हैं पता
वायदा जो था ख़ुद से
कभी आँसू ना बहायेंगे सो
बेइन्ताह आंसुओं का सैलाब
कैसे रोका है खुद से
मुझे ही हैं पता
अनगिनत नश्तर आज़ भी कहीं है मुझ में
कर के मरम्मत हर दर्द की
सौ ज़ख़्म कैसे छुपाये है ख़ुद से
मुझे ही हैं पता
मैं नाउम्मीद थी कितनी फिर भी
तू ख्याली ख़्वाब दिखाता रहा
मैं हर टूटे ख़्वाब पर
कितना मनाती रही ख़ुद को
मुझे ही हैं पता
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