लाखों का पेट भरता है वो
पर खुद भूख में वो जिन्दगी है काटे ।
मजबूर कितना चंद रूपयों की खातिर
जितने में अमीरो के कपडे,जूते है आते ।
दाना दाना उगाता है लहू दे कर वो अपना
जो हम आधा है खाते औऱ आधा बहाते ।
कि ताकंती रहीं घटा को सूनी सी आंखे ।
न आयी कभी बारिश और कभी बरसे ज़्यादा
चाहत है उसकी बस कि खेत लहलाहते
कि उसके भी घर जलता रोज़ चूल्हा
औऱ बच्चे उसके भर पेट खाते ।
इतना सा हम न कर पाये उस के लिये क्या
न कहे उसे गंवार,किसान बेचारा,
सोचे उसे ज़रा इंसानियत के नाते
औऱ ना फेंके, उगाया जो उसने
बोया ,सींचा पसीना बहाते
बस काश हम इतना ही कर पाते
बस काश हम इतना ही कर पाते..
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