Wednesday, January 18, 2017

Bhuddhu sa mann

ऎ खुदा,तू म॓हरबान रहा मुझ पर..
दिया सब कुछ,कुछ पहल॓.कुछ बाद म॓।
छीन कर,माँग कर,सीँच कर ,रो कर,खीँच कर,
लगभग हर चीज ही पा ली।
कीमत॓ अदा करी,चुका कर अपनी मासूमीयत.
अधूरी सी लगती है जिदगी य॓ फिर भी..
और मन की तिजोरी सदा रहती है खाली...
कौन द॓ सकता है जवाब इन सवालो का,
शाँत कर सकता है कौन इस शोर को,
सब जानता तो है,पर मानता नही है,कि मृगतृषणा है य॓,भागता रह॓गा इघर उघर,पर जागता नही है।
खोज कर सारी दुनिया जब थक जाय॓गा..
तब लौट कर बुदधू घर ही तो आय॓गा।
Copyrights @Babita Yadav 2017

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