Monday, February 6, 2017

खंडहर khandhar

पता है,खंडहर  क्यूँ  लगते है अच्छे ?
क्युंकि कहते है वो दास्तां -ए- महफिल ,
कि कभी बसती थी आबादी
वो शोर कोलाहल

हर दीवार ,हर मीनार, हरएक कोना ,
आवाजों से गूँजता ,
जैसे कह रहा हो अपनी मोहब्बत का रोना...
कभी रंग, रौशनी और जूनून कि बारिशे ,
आज सूखा सा दरिया ,सूना सा आँगन और टूटा हुया जीना

दरारे छुपाये हुये कई किस्से,
दीवारें  पे खुर्चे दिलों के है हिस्से,
मुड़ के आते है सब अपनी कहानी दोहराने
क्युँकि वक्त बदल देगा उनकी भी  कहानी के माने

पता है ,खंडहर क्यूँ  लगते है अच्छे ?
क्युँकि तेरे वादों से है झूठे..
और मेरी हालात से है सच्चे .

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