आज़ बारिश मे कुछ पढ़ने का मन है
बाहर न सही कुछ अंदर ही करने का मन है ..
पेड़ पत्ते है गीले ...गीली है पुलिया ..
सड़के भी हुये है सरोबार सी .
गीली सी मन की चौखट
दरवाजे पे आस लगाये बैठी तलब्गार सी ..
मौसम बुला लाया कुछ अनचाहे मेहमान घर पर ..
सूखा कर रखी कोई किताब जैसे
पिछली बारिश से भीगी ..
उकता कर रख दी भूली बिसरा कर
चलो अब खोल ही ले वो पन्ने पुराने
खिड़की पे पड़ती पानी की .बूंदे .
गर्म चाय का प्याला और चंद यादें सिरहाने ..
कहानी बड़ी दिलचस्प है यारो .
कभी हंसाती कभी .रूलाती ..
छिपाये हुए है राज़ हजारो .
इस बार जो पढ़ा आरम्भ से अंत तक
हर पन्ने पर अलग भाव है जागे
हरबाहर न सही कुछ अंदर ही करने का मन है
लफ्ज मे महसूस हो रहा एक नयापन है
आज़ बारिश मे कुछ पढ़ने का मन है ..
All copyrights reserved@Babita Yadav.
Thursday, August 31, 2017
बारिश
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