आज़ फिर खुद को सुनना शुरू किया है
हल्की सी हँसी कि आवाज सुनाई पड़ी है ...
बँधे हुये रखे थे सपने ढेर सारे ..
आज़ खोली है ; सीली सी पोटली चाहतो की ...
धुँधले धुँधले अहसास सर्दी की धूप से ;
और तेरी हँसी ;तेरी बातो की कशिश ..
बन के उमीदें दरवाजे पे खड़ी है .
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