कभी कभी लगता है समंदर है मुझ में
सवालों के अथाह बवंडर है मुझ में
प्यास भी मुझी में ..
अहसास भी मुझी में ..
किसी आलीशान इमारत के खंडहर है मुझ में
कभी जवाब मिल जाता है एक तो ..
सवाल बदल जाता है फिर से ..
कुछ ऐसा है जो हासिल नही होता
बाहर ढूंढ़े जाती हूँ मैं जो
शायद कहीँ अँदर है मुझ में
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