मेरे अश्क तेरे अश्क से ही नमकीन क्यूँ हैं
तू किसी और के लिए ही सही
पर इस कदर ग़मगीन क्यूँ हैं
मुझे तेरे इश्क कि अब चाहत नही
तू इश्क समझता हैं ..ये ही हैं बहुत
पर तू मूझे समझे कभी
ये ग़लत सा यकीन क्यूँ हैं
तुझ पर मरते ही तो.है
किसीको मारा तो नही
फ़िर मेरा जुर्म इतना संगीन क्यूँ है
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