Friday, September 28, 2018

अश्क

मेरे अश्क तेरे अश्क से ही नमकीन क्यूँ हैं
तू किसी और के लिए ही सही
पर इस कदर ग़मगीन क्यूँ हैं
मुझे तेरे इश्क कि अब चाहत नही
तू इश्क समझता हैं ..ये ही हैं बहुत
पर तू मूझे समझे कभी
ये ग़लत सा यकीन क्यूँ हैं
तुझ पर मरते ही तो.है
किसीको मारा तो नही
फ़िर मेरा जुर्म इतना संगीन क्यूँ है

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