Friday, October 26, 2018

आंसू की नियति

एक आँसू आँख के कोर से टपका ,
गाल को गीला करता हुया ,
अपनी नियति से अनजान ..
क्या गिरेगा किसी हथेली पर ..
या जायगा सूख किसी तकिए पर ..
अविरल बहेगा या ना थमने के वास्ते ..
या ओठों पर रुक कर .
चखायेगा नमकीनया .
ख़ुद में समेटे बेचैनिया ..
या यादों के पोटलियाँ .
भरी होता हुया हर क्षण ..
आख़िर तोड़ गया बांध संयम का ..
रोष थी?  या मजबूरियां? उसकी जननी
पर आज़ वो लावारिस सा ,
कभी मोती सा था कीमती ,
आज़ स्याह है घुले काजल सा ,
घुप्प रात मे कहीँ खो गया ..
किसी ने देखा ना जाना ना पुचकारा ,
आख़िर थक कर सो गया ....

No comments:

Post a Comment