मैं तुम्हारी कुछ भी नही हूँ ,
ना मीरा, ना रूक्मणि ,और ना ही हूँ राधा
तुम कैसे बंट जाते हो सब में ?
कैसे पड़ जाते हो पूरे ?
मुझे श्याम चाहिए पूरा ,
ना कि अधूरा आधा
मूझे इन्तेजार भी पसंद है ,
इनकार भी चलेगा ,
चाहें सौ जन्म बीत जाये ,
तेरे मेरे मिलन को ,
मेरा रिश्ता है तुमसे सीधा साधा
तुम ख़ुश रहो, गोपियो संग रचायो रास ,
चाहें अपनी मन मस्त लीला से रीझायो ,
मैं जानतीं हूँ तुम मेरे क्या हो?
सो ना बनूंगी कभी भी बाधा
एक व्क्त होगा ,समझोगे तुम भी,
कि क्या हूँ मैं तुम्हारी ,
ना दिल में जगह चाहूँ ,ना ज़ीवन में,
बस बन जाउ तुम जैसी ,
इतना है इरादा .
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