Thursday, May 7, 2020

एहसास भरा करते थे

डूब रही है कश्ती मेरी
शंका के गहन तूफान है
कहां तो शब्दों की पतवार से
हम तेज भंवर तरा करते थे।

मौन हूं , पर शांत नहीं
ख़ामोश हूं पर गरज रही
क्या वहीं ज़हन है ये जहां कभी 
लफ्ज़ हर पल शोर करा करते थे।

खाली दिन,खाली राते
खाली है मन की गगरी
शायद फिर से बहेगी
सूनी नगरी
पहले जैसे इसमें
कई एहसास भरा करते थे।



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