शंका के गहन तूफान है
कहां तो शब्दों की पतवार से
हम तेज भंवर तरा करते थे।
मौन हूं , पर शांत नहीं
ख़ामोश हूं पर गरज रही
क्या वहीं ज़हन है ये जहां कभी
लफ्ज़ हर पल शोर करा करते थे।
खाली दिन,खाली राते
खाली है मन की गगरी
शायद फिर से बहेगी
सूनी नगरी
पहले जैसे इसमें
कई एहसास भरा करते थे।
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