याद है मुझको
सफेद कमीज़ पर लाल दुप्पटा
तुमसे मिलकर वापस जाते
मुड़ मुड़ देखा कितनी बार।
तुम पहला प्यार थे मेरे
सो भीगी थी खुमार में तेरे
सारे जग से आंखे फेरे
तेरे उस सुर्ख ख़त को
पढ़ पढ़ मन भीगा कितनी बार।
मेरे तो एक तुम ही थे बस
शायद यार तुम्हारे थे और
उड़ती रही संग तेरे
पतंग उड़े,संग जैसे डोर
छलनी हुई ,कटी ,टूटी ,भी
खुद को जोड़ा कितनी बार।
दुपट्टे से रिसता लाल रंग
कमीज़ को कर गया था लाल
चढा था तेरा रंग भी पक्का
छूटे न छूटे कई बरस तक
घिस घिस धोया कितनी बार।
Wah Pehle pyar. Khub piroya hai shabdon ko.
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