पक्की महुया से अटी हुई
वह पगडंडी आज भी
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में।
ढेरों बातें,चिलबिल का पेड़
पोखर के ठंडे पानी मे डूबे रहना
चरमर खटिया पर फिर
थक कर सो जाना
मीठे सपने बांध सरहानों मे।
कच्ची मिट्टी से लीपा घर
खुला खुला भीगा आँगन
घर्र घर्र करती घर की चक्की
भूख जगाता सौंधा चूल्हा
बात कहाँ वो इन मकानों मे।
आंधी के बाद का इंतज़ार वो
टूटे आमो की बौछार वो
झगड़ा करना फिर बटवारों पे
हर दिन इक नया किस्सा
बुनना उन बागानो मे।
बाल इतने छोटे क्यों
करती इतनी बदमाशी क्यों
मक्खन क्यों नहीं खाती हो
लड़को के संग क्यों जाती हो
प्यार झलकता था फिर भी
बूढी ताई के उल्हानों मे,
पक्की महुया से अटी हुई
वह पगडंडी आज भी
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में।