माँ जा चुकी थी
रात का वक़्त
था। सक्षम हस्पताल में पड़ा कराह रहा था। वह
आधी नींद में धीरे धीरे कुछ बुदबुदा रहा है और उसका बदन तेज़ बुख़ार से तप रहा था ।आँखे नींद से बोझिल , थकन, दर्द से शरीर टूटा लगभग बेहोशी में था।बाहर सर्रसराती
हवाएं उसके दर्द को और असहनीय बना रही थी
उसे याद आ
रहा था जब वह केवल 8 साल का था। जनवरी की ठण्ड थी, इसी तरह उसका बदन ठण्ड से काँप रहा
था और तेज़ बुख़ार था जैसे सारे शरीर में किसी ने बहोत चोट मारी हो। वो कराह रहा था और
उसकी माँ गीली पट्टी सर पर रख उसका बुखार काम करने की कोशिश में लगी थी ।
सक्षम का
बुख़ार भी अजीब था, कभी भी किसी दवाई का असर
नहीं होता था। दो दो बार DOLO या क्रोसिन, कुछ भी खाने पर भी नहीं उतरता था।. उस दिन भी माँ
को कुछ समझ नहीं आरहा था तो ठंडी ज़मीन पर अपना हाथ रखती और उसके माथे पर छूयाती। माँ
कहती रहती " अरे कुछ नहीं होगा , तू जल्दी ही ठीक हो जायेगा । मैं हूँ न ?”
सक्षम चिड़
जाता और कहता " उफ़ माँ चुप भी करो ,आपको क्या मालूम कितना दर्द है ? "
लेकिन हां
उसका बुख़ार उतर जाता और वह जल्द ही ठीक हो जाता। उसका बुखार तो सिर्फ माँ के दुलार
से ही ठीक होता था।
उसे फिर याद
आया कि कैसे देहरादून में हॉस्टल में पढ़ते समय एक बार ऐसे ही तेज़ बुख़ार ने उसे जकड़
लिया था ।वह घर से पहली बार दूर रहा था।उसको
घर की याद भी आती तो मन मसोस कर रह जाता ।
बुख़ार के
बारे में दो दिन तो उसने माँ को पता भी नहीं
चलने दिया पैर जब क बर्दाश्त नहीं हुआ तोह माँ को फ़ोन पर बता ही दिया।कहा कि “माँ मैंने
दवा ले ली है चिंता मत करना में ठीक हो जायूँगा।”
पर माँ को
चैन कहाँ। अगले ही दिन दिल्ली से बस पकड़ ,पहुँच ही गयी जैसे तैसे देहरादून।उनको पता
था सक्षम ऐसे जल्दी नहीं ठीक होगा ।वह उसके पास बैठी रही , गीली पट्टी करती रही ,और
बोली "अरे ठीक हो जायेगा कल तक ,अब में आ गयी हूँ न ? "
सक्षम काफी
चिढ़ जाता उसे लगता कि उसका रूम मेट क्या सोचेगा इसलिए कहता "अरे माँ ,में कोई
बच्चा थोड़ी हूँ ,चुप करो बस "
पर हाँ रात
में पसीना आया ,कंपकँपी छूटी , पूरा शरीर भीग गया
और बुख़ार गायब ,फिर न जाने कब वह सो गया ।
अगले दिन
सुबह बिलकुल ठीक मह्सूस कर रह था।
माँ जा चुकी
थी। वापस,दिल्ली
आज भी कुछ
ऐसे ही कंपकँपी आयी, नींद में जैसे माँ गीली पट्टी कर रही थी, उसका बदन पूरा पसीने
से नहा गया। फिर थोड़ी देर में ही बुख़ार उतर गया।
अचानक से
कानो में एक आवाज़ पड़ी, " आप कमरा ३०२ के पेशेंट के साथ है क्या? उठो जल्दी
"
वह हड़बड़ा
कर उठा।
"हाँ,
क्यों क्या हुआ?"
"जल्दी
चले" नर्स बोली।
सक्षम वेटिंग
रूम की कुर्सी पर ही लेट गया था रात को और उसे कब बुख़ार और थकन
से आँख लग गयी उसे नहीं पता ।
उसकी माँ
हॉस्पिटल में भर्ती थी ICU में , उनके लंग्स
में इन्फेक्शन था।
वह उठ कर
३०२ की तरफ़ भागा। वहां डॉक्टर और नर्स खड़े थे। डॉक्टर ने कहा "आपकी माँ नहीं रही
"
नर्स ने बताया
वह जाने से पहले बुदबुदा रही थी "अरे
कुछ नहीं होगा ,मैं हूँ न?"
सक्षम ने
देखा कि उसके कपडे पूरी तरह पसीने से भीगे थे , माथे पर पसीने की बूंदे छलक रही थी
पर अब बुख़ार नहीं था।
आख़िर माँ
जो आयी थी ठीक करने , गीली पट्टी करने।
पर आज सक्षम
फूट फूट कर रोया वह न कह सका
कि " चुप करो माँ ,मैं कोई छोटा
बच्चा नहीं "
माँ जा चुकी
थी। वापस, सदा के लिए
-बबिता यादव
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