पक्की महुया से अटी हुई
वह पगडंडी आज भी
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ चली खेत खलिहानो में।
ढेरों बातें,चिलबिल का पेड़
पोखर के ठंडे पानी मे डूबे रहना
चरमर खटिया पर फिर
थक कर सो जाना
मीठे सपने बांध सरहानों मे।
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में
कच्ची मिट्टी से लीपा घर
खुला खुला भीगा आँगन
घर्र घर्र करती घर की चक्की
भूख जगाता सौंधा चूल्हा
बात कहाँ वो इन मकानों मे
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में
आंधी के बाद का इंतज़ार वो
टूटे आमो की बौछार वो
झगड़ा करना फिर बटवारों पे
हर दिन इक नया किस्सा
बुनना उन बागानो मे।
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में
बाल इतने छोटे क्यों
करती इतनी बदमाशी क्यों
मक्खन क्यों नहीं खाती हो
Akele jungle क्यों जाती हो
प्यार झलकता था फिर भी
बूढी ताई के उल्हानों मे
पक्की महुया से अटी हुई
वह पगडंडी आज भी
याद है मुझे
थाम कर हाथ तेरा बाबा
साथ थी चली खेत खलिहानो में।
डॉ◦ बबिता यादव
चित्र: स्व रचित
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