न मैं सुखी हूँ न मैं दुखी हूँ
न उर्चंकल न अंतरमुखी हूँ
जो पाना चाहो तो भी न पा न पायों
एक ऐसी खुशी हूँ ..
परे सारे चाहतों के घेरो से .
हसरतों की ज़ंजीरों को तोडे
सुध बुध न अपनी न फिक्र किसी और की ..
चलते हुए बहुत दूर आ चुकी हूँ ..
जब तुम थे ,जब तुम नहीं हो
छूटे हाथ कितनों के राह में
टूटे अहसासो की करके मरम्मत
कितनी ही बार आगे बढ़ी हूँ .
मीलों के पत्थर भी
मेरे दायरे के है बाहर ..
धुन अपनी साधे ..
कई दफा कभी किसी किसी
दरिया पे रुकी हूँ ..
और शब्दों का काफिला
हैं मेरा हमदम
निकाल देते हो जैसे सारे ये गम वरना
आग का दरिया हूँ या ज्वालामुखी हूँ ...
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