तेरे मेरे बीच ....
न दीवार कोई वक्त.की
न उम्र की दलील
न .फासला कोई दरमियाँ
बीच में हो चाहे कितनें मील
शक्लों के आडम्बर से आगे
दिल मेरा तेरे पीछे भागे
तुम मुझ जैसे या
मैं तुम जैसी
है कहना मुश्किल
कैसें क्यूँ कब जन्मा ये बँधन
न दिखे कोई डोर या धागे
दो बूंद जैसे समंदर में
गिर कर उसमें ही मिल जाये
अहसास ही बस है तुम और मैं
नामों की न खलिश इस रिश्ते को
बंजर में जैसे कमल खिल जाये
उमीदों का ना नामों ऩिशा
न इसमें कोई छल है ..
तारों की चादर के नीचे हम
ख़ूबसूरत ये लम्हे आज के
न इसमें कोई कल था
न इसमें कोई कल है
कितनी देर तेरी बाहों में सोई
कितनी सांसें गरमाहट की तापी
बिना छुए तुझको एक बार
दुनिया की समझ से बाहर
एक साज़ है बजता मन के भीतर
जब जुड़े रूह के तार
तेरे मेरे बीच ....
न दीवार कोई वक्त.की
न उम्र की दलील
न .फासला कोई दरमियाँ
बीच में हो चाहे कितनें मील
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