वह चलती रही ; मचलती रही
अनगिनत दिन और रात टालती रही
आसुर कभी बाहर के कभी भीतर के मारती रही
वह अपने शिव को तलाशती रही .
टूटी भी; हारी भी पर कभी रुकी नहीं
आधी भी पूरी भी पर कभी झुकी नहीं
वक्त में; कई बार संशय के बादल घिरे
क्रोध ;दुख भारी पड़े और
शिव के रूप में आसुर आसपास फिरें
अडिग रही थामे डोर विशवास की
वह कभी डिगी नहीं
विष के विषम जाल को
वह तारती रही
वह अपने शिव को तलाशती रही
क्यूँकि निश्चित ही हैं वह जल्द जान जायगी
ये तलाश बाहर नहीं अंदर हैं
'शिव 'कही अलग नहीं उसके भीतर हैं
वही सच वहीं सुंदर हैं
कभी दुर्गा सा दिन कभी काली सी रात बन
खुद को अवतारती रही
वह अपने शिव को तलाशती रही
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