तुमने कब का रूख मोड लिया मेरे दर से
और सुखा गये मेरा गुलिस्ताँ
पर ना जाने क्यूं
जिस बगीचे में गुजारे पल हम दोनो ने
उस मे आज़ भी तेरी नाम कें गुलज़ार खिला करती है ..
अब लिखतें नहीं हम खास कुछ भी
गुमसुम से.रहा करते हैं
यहां वहाँ रखीं कुछ यादें हैं
हाँ आज़ भी मेरी किताबों में
अकसर तेरी तस्वीर मिला करती हैं ..
यूं तों उम्मीद नहीं तेरी वापसी की
ना अब कोई शिकवा ना रुस्वाइयाँ
पर कभी कभी मेरी शायरी बिलख कर
मेरी तन्हाइयों से
तेरे ना होने का गिला करती है ...
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