Tuesday, September 1, 2020

मॉनसून

इस बार सिर्फ हाथ लगा इंतज़ार
तुम आयी तो कई बार
पर जैसे मेहमान हो जल्दी में कोई
बरसी और चली गई 
न सुकून से एक कप चाय पी
न ही बाते हुई दो चार।

तुम नहीं जान सकी
मै उदास था कुछ इस कदर
अपनों से दूर था
न इस बार कोई फितूर था
हां खाली काफ़ी हद्द तक जरूर था
सोचा था तुम अयोगी
संग वक़्त कुछ बितायोगी 
पर,
शायद तुम भी थी लाचार।

अभी भी घड़ियां बची है
तुम्हारे लिए एक आध,
कविताएं भी रची है
रूठ कर तुम यूं जायो न
मुझे आस है आज भी तेरी
बरस जा मेरे आंगन में
दिल गाता है मल्हार


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