तुम आयी तो कई बार
पर जैसे मेहमान हो जल्दी में कोई
बरसी और चली गई
न सुकून से एक कप चाय पी
न ही बाते हुई दो चार।
तुम नहीं जान सकी
मै उदास था कुछ इस कदर
अपनों से दूर था
न इस बार कोई फितूर था
हां खाली काफ़ी हद्द तक जरूर था
सोचा था तुम अयोगी
संग वक़्त कुछ बितायोगी
पर,
शायद तुम भी थी लाचार।
अभी भी घड़ियां बची है
तुम्हारे लिए एक आध,
कविताएं भी रची है
रूठ कर तुम यूं जायो न
मुझे आस है आज भी तेरी
बरस जा मेरे आंगन में
दिल गाता है मल्हार
No comments:
Post a Comment