Monday, March 14, 2016

ए दोस्त

अपना  एक  दोस्त ख़ास  था  जो...
अब  सभी का  सा  लगता है.
जिँदँगी की  मश्रू फियत के बादलों मे..
मोहब्बत  का चाँद  अब फीका सा लगता है ।
कहने  को कोलाहल  है...चारों ओर ,और हैं रँगीनिया ,
पर अचानक सब  क्यू झूठा सा  लगता है ।
खुशनुमा साथ था कुछ दिनो का ऐ दोस्त ,
पर अब तू कुछ रुठा सा लगता है।

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