Tuesday, February 26, 2019

अकेला

हर तरफ़ बिखरी टूटी आत्माओ का मेला है ..
फ़िर भी हर श्क्स कितना अकेला है ..

क्या है जो रोकता गले लगाने से
शायद कोई भाव नादानी का
या नशा गुरूर का
वरना  रोने को भी एक कन्धा हो
और बेवज़ह हंसने का हो सिलसिला
एक रौशनी को तरस रहे सब
पर अन्धकार दिलो में फ़ैला है ..

उमर या तजुर्बे जब
धो देंगे सारी दूरियां
समझ आएगा जब तलक
बढ़ ना जाये मजबूरियां
सिमट कर रह ना जाये कही
अपने ही दरीचे में
कि ऊँचाई दीवारो की नाप भी ना पायेगे
वक्त ही केवल गवाह होगा
कि किसने कितना जीवन झेला है ..

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