तुम्हारे घर की उस चौखट तक
मैंने कुछ पत्थर रखे थे रंग बिरंगे
धूप छांव हर मौसम में मैं
उन पर चल तुम तक पहुँच थी पाती
कुछ इस तरह रखी दरमियाँ वो पत्थर
इस क़दर याद पड़े थे
बिन फिसले बरसात में भीगी थी मैं
और अंधेरे में तुम हाथ बांध मौन खड़े थे
भूली भटकी हर डगर मैं फिर भी
हर राह मुझे वही ले जाती ..
जून की तपती दोपहर
पाँव मेरे भी जल थे जाते
आंखे मीचे ढक हाथों से
वो हरा मख़मली दुपट्टा सर पर रख
तुम्हारी ठंडी आगोश की चाह में
चार क़दम उस दूरी के
सौ मीलों सा अहसास कराती ..
मौसम बीते , बीते साल
ना रही ठण्ड अब ,ना रहा मलाल
गुजर गयें वो धूप और बारिश
थी किस्मत की या तेरी साज़िश
हाँ याद साथ है आज भी सारी
कि जब देखूँ कहीँ रंगीन पत्थर
चाहते फ़िर एक बार लौट है आती ..
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