Thursday, March 21, 2019

क़िताब हो गयी open mic

ख़्वाबिदा सी जिंदगी
जूस्तूजू मे तेरी बीती
इतनी चाँदनी बटोरी गफ़लत की रातों की
कि जिंदगी मेरी महताब हो गयी ..

मुन्तजिर अब बरदाश्त के परे हैं
जख्म वैसे अब भी हरे हैं
ना अब मालूम हॊता हैं दर्द कि
तेरी दूरियां की दयार  बेहिसाब हो गयी ...

सालों से भरी आंखों मे नमी
ना जाने कहाँ जा कर थमी
बेजवाब सवालो के भार से
अश्को की नदी आज़ शराब हो गयी ..

तेरी ख़बर नहीं आयी
ना आए तुम कभी
सुन सुन तेरी कहानियां औरो से
मै ना जाने कब ईक क़िताब हो गयी ..

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