Wednesday, August 7, 2019

समेट रही हूँ kalahouse

समेट रही हूँ  ज़िन्दगी अपनी ,
कि इक छोटे से बक्से में आ जाये ,

पेहले फाडी पुरानी यादो के पन्ने ,
फ़िर तोड़े उलझे रिश्तो के धागे,
चटकायी शीशीयां कभि ना पूरी होने वाली,
आशाओ की एक एक कर,

अल्बम ,
कार्ड्स ,
सब रद्दी में डाले ,

दोस्ती जो खास थी ,
पुरानी थी ,
मजबूत थी,
तोड़ी मरोडी परखी थी,
वो बक्से में रखी ,
बाकी बनावटी चीज़े ,
टुकड़े कर फेंकी ,

और तों और ,
शौक हज़ारों थे पाले ,
अब कूच एक आध ही रख छोड़े है ,
ख़्वाब कुछ राख लिए ,
कुछ बेदर्दी से तोड़े है ,

अहसास ,जज्बात ,याद्श्त, भी
कम कर डाली ,
दिलो दिमाग भी ,
काफ़ी कर दिया हैं खाली,

वक्त हो चला हैं,
सफ़र आसान करने का ,
हाँ, अभी नहीं आया हैं मरने का ,

पर सामान कर ले जितना हल्का,
भरोसा भी  क्या  अब कल क़ा,

एक बक्सा भरा सारी उम्र के लिए काफ़ी हैं ,
शायद अभी अपनो की बेवफ़ाई क़ा ,
कुछ बोझ बाकी हैं ...

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