Saturday, August 17, 2019

कोई औऱ ही ज़हर था

क्यूं तेरी आंख मे आँसू आए
क्यूं तेरी यादों मे खुश्बू आयीं
क्यूं बैठी तू इंतजार मे ना आने वाली रेल के
अब  साथ नहीं वो तेरे इस खेल में
जिनमे खेली थी तू छिपनछिपायी
वो कोइ औऱ ही शहर था ....

बचपना था ,नादानिया थी
संग था ,मेल था ,शैतानिया थी
तेरे दर्द में वो साथ था
पकड़ने वाला वो हाथ था
साथ था सुबह ,दोपहर ,रात का
हँसना खेलना समझने समझाने क़ा
वो कोइ औऱ ही दहर (era )था ...

तेरी बेल कुछ  नाज़ुक सही
तुझे किसी दीवार की हैं खोज सी
ये हैरानिया,  परेशानियां ज़िन्दगी की
हैं लगभग रोज़ ही
ना पेहले सा मौसम हैं अब
किसी पानी ,किसी मिटटी में ना हैं इतना  दम
जो तेरी बेल क़ो सुखा गया
वो कोइ और ही जहर था  ....

No comments:

Post a Comment