रोज़ करता बात था
फिर न जाने क्या हुआ
रोज़ के बदले हफ़्ता हुआ
और दूरियां बढ़ती गई
मैने जैसे बेरुखी भांप ली
उसने भी दूरी नाप ली
मैने भी ज़िद्द पकड़ ली
छोड़ दिया राह देखना
देखना, की वो माजूद है कि ना
फिर...
वो पलट कर आया नहीं
हमने भी बुलाया नहीं
अब बीत गए कई साल है
वक़्त भी क्या बेमिसाल है
याद कभी आए तो
दिल रोता बेहाल है
जिसको मिलना न था
उसे मिलाया ही क्यों
जब पलट कर जाना है था
तो फिर वो आया ही क्यों।
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