तुमको अपना जान के सुना दिया हाल अपना
और बाँट लिया कुछ समान अपना
तुम समझ न सके इस साँझेदारि को
और चार ले आये..हाथों में लिये अरमान अपना
साँझेदारि.यकीन..दोस्ती सब काँच सी थीं
टूटने मे देर लगती कहाँ
बिखर गया खुशनुमा सपना
नींद भी अधूरी सी थी
ऐसे मे मेरी मामूली.सी आस
इस उथले से रिश्ते मे भला टिकती कहाँ...
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