Wednesday, May 18, 2016

उथला सा रिश्ता

तुमको अपना जान  के सुना  दिया  हाल अपना
और बाँट लिया कुछ समान  अपना
तुम समझ न सके इस साँझेदारि  को
और चार ले आये..हाथों  में लिये  अरमान अपना

साँझेदारि.यकीन..दोस्ती सब काँच  सी थीं
टूटने मे देर लगती कहाँ
बिखर गया खुशनुमा सपना
नींद भी अधूरी सी थी
ऐसे मे मेरी  मामूली.सी आस
इस उथले से रिश्ते मे भला  टिकती कहाँ...

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