पिघली सी धूप से तुम
मेरे जीवन की खिड़की से
सरक आए हो ..
मेरी बुझी आशायो को
फिर सुलगा रहे हो ..
मैने तो बंद करदी थी खिड़कियाँ औऱ दरवाज़े
पर तुम्हारी हल्की सी आहट ..
से आहत हो कर खोल दी है ..
सोचा भीगने दूँ ख़ुद को इस गरमाहट मे
कितनी अच्छी है सोहबत तुम्हारी ..
सिली हुई सारी ख्वाइश सब रख दी है बाहर
खुल कर इत्र सी महकेगी जब
मत कहना कि तुम बहक रहे हो ..
क्यूँकि बारिशों के बाद आयी इस रौशनी मे तुम भी
कितना चहके रहे हो .
कितनी अच्छी है सोहबत तुम्हारी ..
कितनी अच्छी है मोहबत तुम्हारी
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