ए इंसान तू
किस इन्तेजार में जी रहा हैं
कल किसने देखा हैं
ऐसी क्या प्यास मोह की ?
जो रोज़ ज़हर अधूरी ख्वाइशों क़ा पी रहा हैं ..
छोड़ दे सब चाहत
रम जा तू खुद में
ख़ुदा की ओट में ले आसरा
दुनिया के लोग हैं सब आने जाने
आखिर में तेरे साथ बस वो ही रहा हैं ..
ये माया हैं उस रब की ही छाया
तू भूल उसको ;छाया में रमा हैं
छाया किसी किसी के हाथ ना आनी
सदा के लिये इसका साथ क्या कभी रहा हैं ?..
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