Monday, July 9, 2018

tum.नहीं ho

आज़ वहीं बारिश हुई
पर तुम नही हो
हवायें भी सर्द थी
पर तुम नही हो
वो पुलिया गीली थी
जंहा हम बैठते थे
पर तुम नही हो
आज़ उस चायवाले ने
फ़िर बेचारगी से देखा  मुझे
क्यूँकि तुम नही हो ..
शाम की वो बस की भीड़
अज़ीब सी घूरती हैं
क्यूँकि तुम नही हो ..
वो रास्ता जो खत्म हो जाता था पल भर में
आज़ मीलों सा लगता हैं
क्यूँकि तुम नही हो ...
अब सालों  से बालियां नही बदली
क्यूँकि तुम नही हो .
ना कोई काजल मेरा पोंछता मेरे आँचल से
क्यूंकि ....
राह पार करते व्क्त खुद रोकती हूँ आती गाड़ियाँ
क्यूँकि ...
अब सब कुछ थम गया हैं
क्यूँकि तुम नही हो ....
Copyrights reserved @Babita Yadav 2018

2 comments: