Saturday, January 11, 2020

मेरे जोशीले क़दम

मेरे जोशीले क़दम 
मेरी मंजिल की ओर चल पड़े  हैं 
कभी पड़ाव पर रुक कुछ सोचते हैं ...
शंका की मिट्टी कभी किसी पल 
ठहर के पोंछते हैं ...
मेरे जोशीले क़दम 
मेरी मंजिल की ओर चल पड़े  हैं ...
किसी अपने की पुकार सुन पीछे से 
ख़ुद को रोकते हैं ..
ठोकरे खा कर कभी फूँक फूँक 
ख़ुद को टोकते हैं ..
पर मेरे जोशीले क़दम 
मेरी मंजिल की ओर चल पड़े  हैं ...
किसी नए मुक़ाम पर 
किसी नई दिशा पर मुड़ 
विस्मय में कभी चौंकते हैं ...
उल्लास से कभी कूदते 
कभी काँटों के दर्द से हून्कते है ..
बह कर कही किसी साथ के 
किसी मोड़ पर डगमगाये भी 
तोड सारे भरम फ़िर 
सी कर ज़ख़्म एक बार 
मलाल सारा सोखते है ...
कोई मिल गया जो हमसफ़र सही 
वरना बिना कारंवा के निकल पड़े  है ..
मेरे जोशीले क़दम 
मेरी मंजिल की ओर चल पड़े  हैं 

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