बहुत तादाद में बोला गया झूठ भी
सच ही लगता है
तर्क से साबित करो
सबूतों से प्रमाणित करो
या ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर झूठ कहो
जब तक कि वह सच ना लगने लगे
सच है क्या आखिर ?
जो पुरखों से सुनते आये है ?
या जो किताबों में पढ़ते आये है ?
या तजुर्बा है बस ?
पर तजुर्बा तुम्हारा और मेरा
अलग अलग है
तो तुम्हारा सच मेरे सच से
अलग भी हो सकता है
फ़िर सच क्या है सच में ?
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