माना कि कोई खास बात नही दिखती मुझ में तुमको
पर मैं वो चंदन हूँ जो बंद सन्दूकों से भी फ़िजा महका दूँ ..
कोशिशे तमाम की जाएँगी इस मशाल को बुझाने की
पर वो आलम भी होगा जब अपनी चिंगारी से मैं तेरे सारे बुझते दिए दहका दूँ ...
ख़ामोशी से आज़ वक्त की बदलतीं तबीयत हैं देखी
पर कहना कुछ जब वक्त आनें पर खामोश महफ़िलें ना चहका दूँ ...
पानी सी मालूम होते जाम को यूं इस तरह ना बरबाद समझो
क्यूँकि तेरी संभली सी फितरत को कहीँ एक बूंद से ना बहका दूँ ..
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