Wednesday, May 30, 2018

मैं ले गये

तुम्हारी खुशबू से भरने का था मन
पर तुम सूखे गुलाबों की तरह दिल की किताब में रह गये ...
बैठे रहते हम इन्तेजार- ए -उल्फ़त में
अच्छा हुआ जो "इन्तेजार ना करना"कह गये ..
ना जाने क्यूँ तेरे झूठे वादों का था यकीन आखिर तक
इसलिये बेरहम दूरियां और तेरी बेरुखी सह गये ..

हर बार तुम आते थे देने खुद को
पर हर बार मुझमें से थोड़ा  "मैं" ले गये ..

No comments:

Post a Comment