वक्त के बांध कितने मज़बूत ही सही
रोष के तूफान फ़िर भी कभी मचलते हैं ..
कहने को इतने आगे निकल आये हम
तेरे यादों के शहर से
फ़िर भी आजाज़ के आँसू नहीं सम्भलते हैं ...
पूँछते हैं कई सवाल खुद से; कभी ख़ुदा से
जवाब मिला नहीं कोई आज तलक
और ना ही सवाल कभी बदलते हैं ...
मासूम सी मौह्हबत थी अपनी
चाहत थी तुमको पाने की
फुसला कर दिल को रखते हैं अब
पर ऐसे दिल कहाँ बहलते हैं ?..
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